सतना जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि विपणन का आर्थिक विश्लेषण
पुष्पराज कुमारी तिवारी
शोधार्थी (वाणिज्य) शा. ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवाा (म.प्र.)
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ABSTRACT:
कृषि मानव सभ्यता के प्राचीनतम उद्यमों में से एक है, मानव को सफलतापूर्वक जीवन-यापन करने के लिए अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती है, जिनमें से पेट की भूख सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसकी पूर्ति कृषि के द्वारा की जाती है, और यही कारण है कि प्राचीन काल से ही इसे एक महत्वपूर्ण व्यवसाय माना जाता है। कृषि आज भी अनेक विकसित एवं विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था का आधार है, वास्तव में कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदण्ड है। अतः कृषि का लाभप्रद होना सरकार एवं राष्ट्र के लिए अनुकूल बात होगी। केने का कहना है कि उद्योग एवं वाणिज्य दोनों कृषि के ही अधीन हैं, क्योंकि इन्हें कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है। प्रकृति वादियों ने तो यहां तक कहा है कि केवल-’’कृषक राष्ट्र ही समृद्ध एवं टिकाऊ साम्राज्य स्थापित कर सकते हैं। फलस्वरूप हरित क्रान्ति का सृजन और चलन हुआ, आधुनिक तकनीकी युक्त कृषियन्त्रों, कृषि उपकरणों, उन्नत बीजो का प्रचलन तथा रासायनिक उर्वरको के उपयोग में वृद्धि ने उत्पादन तथा उत्पादकता के स्तर को समुनन्त किया। कृषि के उन्नत के साथ कृषि विपणन व्यवस्था का उन्नत होना आवश्यक है, क्योंकि यह अनुभव किया जाने लगा है कि कृषि उत्पादों के विपणन का उतना ही महत्व है जितना स्वतः उत्पादन का वस्तुतः विपणन की क्रिया का अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि इसके द्वारा उपभोग और उत्पादन में सन्तुलन ही नही वरन् अधिक विकास का स्वरूप भी निर्धारित होता है।
KEYWORDS: कृषि विपणन, भारतीय अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादन।
INTRODUCTION:
विपणन एक आर्थिक क्रम है जिसमें वस्तुओं व सेवाओं को अदला-बदला जाता है तथा नका मूल्य मुद्रा में आॅका जाता है। इसका आशय विनिमय सम्बन्धी उन तमाम क्रियाओं से है जिनके द्वारा वस्तु को उत्पादन केन्द्र से उपभोक्ता तक हस्तांतरित किया जाता है।
कृषि विपणन एक मिश्रित शब्द है जिसके अन्तर्गत वह सभी क्रियाओं एवं सेवायें सम्मिलित होती है जो कृषि उपज को कृषक से उपभोक्ता तक पहुॅचाने में सम्मन्न की जाती है।
प्रो. थामसन के अनुसार:-
कृषि विपणन के अध्ययन में वे सभी कार्य एवं कच्चामाल एवं संस्थाएं सम्मिलित होती हैं जिनके द्वारा कृषकों के फार्म पर उत्पादित खाद्यान्न, कच्चा माल एवं उनसे निर्मित माल का फार्म से उपभोक्ताओं तक संचालन होता है।
प्रो. अबोट के अनुसार:-
कृषि विपणन से तात्पर्य उन सभी कार्यों से होता है, जिनके द्वारा खाद्य वस्तुएँ एवं कच्चा माल फार्म से उपभोक्ता तक पहुंचता है।
सतना जिले में भी कृषि विकास सम्बन्धी इन योजनाओं के क्रियान्वयन के साथ यहाॅ की जर्जर अर्थव्यवस्था को सुधारने का प्रयास तो किया गया, और यहाॅ कि वसुन्धरा को सुजलाम् सुफलाम् की सार्थक परिधि के लाने के लिए सिंचाई की अनेक योजनाओं के साथ तलाबों जैसी सिंचाई परियोजना का क्रियान्वयन हुआ। फलतः के क्षेत्र में भू-भाग भी समुन्नति की ओर अग्रसित हुआ।
कृषि के उन्नत के साथ कृषि विपणन व्यवस्था का उन्नत होना आवश्यक है, क्योंकि यह अनुभव किया जाने लगा है कि कृषि उत्पादों के विपणन का उतना ही महत्व है जितना स्वतः उत्पादन का वस्तुतः विपणन की क्रिया का अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि इसके द्वारा उपभोग और उत्पादन में सन्तुलन ही नही वरन् अधिक विकास का स्वरूप भी निर्धारित होता है।
कृषि क्षेत्र पूंजी प्रधान उद्योगों को श्रम शक्ति उपलब्ध कराता है। आज भी भारत में अधिकांश जनसंख्या और श्रम शक्ति कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है। लेकिन कृषि क्षेत्र मंे रोजगार के अवसर अत्यंत सीमित होते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाली श्रम शक्ति को, ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के समुचित अवसर प्राप्त नहीं होते हैं। अतः नगरी तथा नये निर्मित बड़े-बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में इन श्रम शक्ति को रोजगार मिलने का पर्याप्त अवसर मिलता है। वास्तव में औद्योगिक विकास में जो श्रम शक्ति की आवश्यकता होती है। उसकी आपूर्ति अधिकांशतः कृषि और ग्रामीण बाहुल्य क्षेत्रों से की जाती है। यही कारण है कि आज भी भारत में महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब जैसे औद्योगिक प्रधान विकसित क्षेत्रों में सस्ती श्रम शक्ति की जो आपूर्ति होती है वो अधिकांश रूप से बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और उड़ीसा, छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान पिछड़े क्षेत्रों से आपूर्ति होती है। प्रो. मेडिसन के अनुसार-’’भारत में औद्योगिक विकास को सहज, सरल और गतिशील बनाने में सस्ती श्रम शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसकी अधिकांश आपूर्ति का मुख्य स्त्रोत कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाली सस्ती श्रम शक्ति में निहित है।
कृषि विपणन में वे सभी कार्य एवं संस्थाएं, जिनके द्वारा कृषकों के फार्म पर उत्पादित खाद्य पदार्थ, कच्चा माल एवं उनसे निर्मित माल जेसे बुने हुए वस्त्रों का फार्म से अन्तिम उपभोक्ता तक संचालन तथा इन कार्यों का कृषकों, बिचैलियों एवं उपभोक्ताओं पर होने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। आधुनिक युग में कुशल विपणन के द्वारा उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन वृद्धि की पृष्ठभूमि बनाई जाती है। किसी देश के आर्थिक विकास में व्यवस्थित कृषि विपणन महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कृषि उत्पाद में वृद्धि नई तकनीकी के अधिकाधिक प्रयोग से की जा सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि अधिक उत्पादन से कृषक की आय भी अधिक हो। कृषकों को उत्पादन वृद्धि से अनुकूलतम आय तभी प्राप्त हो सकती है जब पैदा की गई कृषि वस्तुओं के विक्रय के लिए क्षेत्र में सुव्यवस्थित विपणन-प्रणाली विद्यमान हो। किसानों को अधिक मेहनत करके उत्पादन वृद्धि करने की प्रेरणा तब मिलती है, जब उसके द्वारा उत्पादित माल की उसे उचित कीमत प्राप्त हो, उसे कम विपणन लागत देनी पड़े, ताकि उसकी आय में वृद्धि हो। कृषकों की आय में वृद्धि होने से राष्ट्रके बहुसंख्यक वर्ग (खेती से जुडे़ लोगों) की आय में वृद्धि होती है, अतः राष्ट्रीय आय में बढ़ौतरी होती है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि होने पर सरकार विकास कार्यक्रमों पर अधिक धनराशि खर्च करेगी, जिससे उत्पादन में वृद्धि होगी तथा देश के आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
कृषि विपणन की क्रियायें अथवा सेवायें (ैमतअपबमे व िडंतामजपदह)
कृषि उपज के विपणन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण क्रियायें सम्मिलित की जा सकती हैं-
1. कृषि उपज का एकत्रीकरण।
2. कृषि उपज का प्रमाणीकरण तथा श्रेणी विभाजन।
3. कृषि उपज का विधायन।
4. उपज का गोदामों में रखना।
5. उपज का उत्पादन केन्द्र (ग्राम) से उपभोग केन्द्र तक परिवहन।
6. उपज का थोक व्यापार।
7. उपज का फुटकर व्यापार
8. उपरोक्त कार्यो के लिये वित्त व्यवस्था।
9. सभी कार्यो में निहित जोखिम उठाना।
इस सभी कार्यो में लिये अनेक एजेन्सियाँ होती है जो कि बड़ी अव्यवस्थित तथा दोषपूर्ण हैं। एक लम्बे अर्से से ये सभी उत्पादक तथा उपभोक्ता का शोषण करती चली जा रही है। इसलिये कृषक के लिये अपनी उपज के विपणन पर ध्यन देना उतना ही आवश्यक है जितना कि उत्पादन व्यय पर।
कृषि विपणन पद्धतियाॅ तथा इसमें परिवर्तन प्रदेश के अन्य जिले में सतना जिले के कृषि विपणन का तुलनात्मक अध्ययन पर शोध कार्य कर कृषि भण्डारण, कृषि विपणन, कृषि परिवहन, कृषि नीति आदि सुविधायें प्रदान किये जाने के साथ ही कृषि विपणन व्यवस्था को विकसित किया जाएगा, इससे सम्बन्धित सुझावों को कृषि विपणन के पिछड़ेपन को दूर करना, उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि, कृषि विपणन तकनीक में सुधार कृषि उपज में वृद्धि एवं संग्रहण किये जाने का प्रयास करने के साथ-साथ कृषि विपणन के परम्परागत पद्धतियों के स्थान पर कृषि विपणन पद्धतियों में वर्तमान तकनीक उपलब्ध कराए जाने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिए जायेगे, कृषि विपणन में परिवहन एवं यातायात का महत्वपूर्ण स्थान होता है।
सतना जिले को प्रदेश एवं देश के कृषि विपणन बाजार से जोड़ने हेतु आवश्यक सुझाव के साथ-साथ कृषि मूल्यों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण नीति निर्धारित की जायेगी। कृषि विपणन भी उपर्युक्त महत्वपूर्ण तथ्यों के साथ-साथ कृषि उत्पादन का परिसंस्करण, कृषि परिसंस्करण हेतु प्रमुख नीतियो यथा ‘कृषि’ उत्पाद को सुखाना, विपणन के लिए उपलब्ध कराना एवं वित्तीय सुविधाएॅ उपलब्ध कराए जाने का प्रयास किया जाएगा। शोध क्षेत्र के कृषि विपणन की अपार सम्भावनाएॅ होते हुए भी यहाॅ की कृषि विपणन भी व्यवस्था ठीक नहीं है।
पूर्व शोध की समीक्षा:-
काॅनराय एट आल (2001) भारत में ग्रामीण कृषक परिवारों के पास आय के साधन के पशु उपलब्ध है। राष्ट्रीय स्तर पर पशुधन की आबादी बढ़ी है हालांकि एक क्षेत्रीय पैमाने और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में विशेष रूप से स्थिति बहुत अलग और अधिक जटिल है, उदाहरण के लिए ग्रामीण क्षेत्र के भीतर पशुधन बढ़ी जाती है तथा शहरी क्षेत्रों में पशुधन की आबादी कम होती है। जिससे ग्राीमण किसानों की स्थिति सुधर रही है।
ब्रिजेन्द्र पाल सिंह (2000) भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। इसके विकास से अर्थव्यवस्था में दृढ़ता आती है। राष्ट्रीय आय में इसका योगदान 34 प्रतिशत के आसपास है। गत वर्षो में खाद्यान तथा व्यावसायिक फसलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाले तत्वों में प्राकृतिक और आर्थिक दोनो महत्वपूर्ण है। विगत दो-तीन दशकों में भारत में द्वितीयक क्षेत्र एवं तृतीयक क्षेत्र को तीव्र गति से विस्तार हुआ है प्रभावी देश की कार्यशील जनसंख्या का 52 प्रतिशत प्राथमिक क्षेत्र पर आश्रित है। देश में कृषि 115.5 मिलियन कृषक परिवारों की आजीविका का माध्यम है। यहाँ तक कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद का लगभग 15 प्रतिशत भाग कृषि व उसकी सहायक क्रियाओं से प्राप्त होता है। भारत में अनेक महत्वपूर्ण उद्योग प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर देश की 1.21 अरब से अधिक जनसंख्या के खाद्यान व खाद्य पदार्थो की आपूर्ति कृषि क्षेत्र से ही की जाती है। करोड़ों पशुओं को प्रतिदिन चारा कृषि क्षेत्र से ही प्राप्त होता है।
डाॅ. आर. के. भारतीय (2006) भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर लघु तथा सीमांत कृषकों खेतिहर मजदूरों तथा अन्य श्रमिकों, शिल्पियों, व्यवसायिक एवं सेवा करने वाले परिवारों का ही बाहुल्य है। परन्तु आज भी इनमें से अधिकांश परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं! अतः यह कहा जा सकता है कि भारत का समाजिक एवं आर्थिक विकास ग्रामीण क्षेत्रों के बुनियादी विकास पर ही आधारित है। ग्रामीण विकास की अनेकोनेक समस्याएं जिनमें प्रमुख रूप से आर्थिक अधोसंरचना, कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग व समान्वित विकास की समस्याएं है!
शोध प्रविधि:-
सतना जिले में स्थित मण्डियों में से निदर्शन विधि का अनुप्रयोग करते हुए जिले से सभी मण्डियों का अध्ययन कर कुछ चिन्हित मण्डियों को प्रतिक अध्ययन के लिए चुना जाएगा। मण्डियों के चयन में उनकी स्थिति कार्यक्षेत्र आदि का ध्यान रखते हुए जिले में सभी तहसीलों में से एक-एक विनियमित मण्डी तथा जिले में एक प्राथमिक स्तर में गांव में स्थित विनियमित मण्डी का चयन कर अध्ययन किया जावेगा।
किसी भी विषय वस्तु के अध्ययन के लिये एक सुनिश्चित प्रविधि की आवश्यकता होती है। सुनिश्चित प्रविधि के माध्यम से ही अध्ययनरत सामग्री का समुचित विश्लेषण कर विषय का विधिवत् प्रतिपादन किया जाता है। इस सर्वमान्य अवधारणा के अनुरूप प्रस्तुत शोध के अध्ययन हेतु पूर्ण में ही अध्ययन की एक प्रविधि का निर्धारण कर लिया जाता है। इस अध्ययन हेतु मूलतः द्वितीयक संमकों को आधार बनाकर अध्ययन को पूर्ण करने की प्रविधि अपनायी गयी है। इस हेतु चरण बद्ध योजना का निर्धारण किया गया है।
अध्ययन के लिए प्रयोग किये जाने वाले द्वितीयक संमकों का संकलन किया गया। संमकों का संकलन संभागीय सांख्यिकी कार्यालय (रीवा) जिला सांख्यिकी कार्यालय (सतना), यूनियन बैंक आॅफ इंडिया (अग्रणी जिला कार्यालय सतना), कृषि विज्ञान केन्द्र (सतना), भू-राजस्व विभाग, भू-अभिलेख विभाग जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक, जिला व्यापार एवं उद्योग केन्द्र (सतना) आदि के कार्यालयों से संपर्क कर आवश्यक संमक संकलित किये गये है। आवश्यकतानुसार इंटरनेट आदि के माध्यम से भी संमक संकलित किये गये है। इसके अलावा विभिन्न कार्यालयों द्वारा प्रकाशित पत्र पत्रिकाओं तथा रिकार्डो द्वारा भी संमक प्राप्त किये गये है। आकड़ों के संग्रहण हेतु संबंधित एजेन्सियों द्वारा व्यक्तिगत संपर्क भी स्थापित किये गये है। द्वितीयक समंको का संकलन शासकीय तथा अशासकीय प्रकाशनों से किया गया है।
शोध के उद्देश्य:-
अध्ययन का उद्देश्य-
इस अध्ययन के मूल उद्देश्य निम्नानुसार है-
ऽ भूमि व्यवस्था के अंतर्गत भूमि सीमा कानून का क्रियान्वयन भू-समतलीकरण तथा भूमि रखरखाव में हुए परिवर्तन परिवर्द्धन की प्रक्रिया का आंकलन करना।
ऽ सिंचाई की उपलब्ध सुविधाएं तथा इस परिपेक्ष्य में निर्धारित अवधि के बाद कृषि सिंचाई सुविधाओं में हुए संरचनात्मक परिवर्तन का आंकलन करना।
ऽ सतना जिले के विभिन्न ग्रामीण स्थिति का मूल्यांकन करना।
ऽ कृषि उद्योगों एवं व्यवसायिक क्षेत्रों में वनों के योगदान का मूल्यांकन करना।
ऽ कृषि एवं कृषि पर आधारित उद्योगों के विकास की संभावनाओं को अनुमानित करना।
ऽ कृषि व्यवस्था तथा औद्योगिक विकास के क्षेत्रीय एवं जिला स्तरीय प्रकृति का मूल्यांकन करना।
ऽ कृषि की प्रकृति एवं विशिष्टाओं का सूक्ष्मतम उपयोग परीक्षण करते हुए कृषि विकास हेतु उचित नीति निर्धारण का औचित्य प्रतिपादित करना।
ऽ सतना जिले के कृषि विपणन का ऐतिहासिक महत्व जानने का प्रयास करना।
ऽ सतना जिले के कृषि विपणन उद्योगों को भारत के मानचित्र में लाने का प्रयास करना।
ऽ कृषि विपणन ग्रामीण क्षेत्र की उत्पदान क्षमता का नियोजन तथा नियंत्रण का अयापन करना।
शोध का क्षेत्र -
सतना जिला मध्य रेलवे के प्रमुख रेल मार्ग बाम्बे-कलकत्ता पर कटनी-इलाहाबाद के बीच स्थित है। यहाॅ से राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 07 गुंजरता है। सतना जिले के उत्तरी सीमा पर उत्तर प्रदेश का बांदा जिला पूर्व में मध्यप्रदेश का सतना तथा सतना जिला, पश्चिम में मध्यप्रदेश का पन्ना जिला तथा दक्षिण में मध्यप्रदेश का कटनी और शहडोल जिला स्थित है। सतना जिला मध्यप्रदेश के सतना संभाग के पश्चिमी भाग में तथा राज्य के उत्तर पूर्व भाग में स्थित है। सतना जिला उत्तर में 23058 अक्षांश से 25012 अक्षांश तक तथा पूर्व में 80021 देशांतर से 81023 देशांतर तक है। समुद्र की सतह से सतना की ऊॅचाई 317 मीटर है। मध्यप्रदेश में विन्ध्य क्षेत्र के मैदानी भाग पर बसे हुये सतना जिले का क्षेत्रफल 7424 वर्ग किमी. है। जिले की कुल जनसंख्या 2011 की जनगणना के आधार पर 22,28,619 है जिसमें 11,56,734 पुरूष एवं 10,71,885 स्त्रियाॅ सम्मिलित है। जिले की जनसंख्या वृद्धि का 10 वर्षीय प्रतिशत 19.2 है जनसंख्या की वृद्धि से सतना जिला मध्यप्रदेश के पुराने 50 जिलो में 5वाॅ स्थान रखता है।
शोध का महत्व एवं कठिनाइयाॅः-
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है जिसके समुचित विकास के बिना किसी भी प्रकार की आम जीवन से जुड़ी विकास की गतिविधियों की परिकल्पना नहीं की जा सकती। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होने वाली जानकारियों के अनुसार देश का सर्वाधिक वर्ग कृषि से संबंधित है देश की कृषि व्यवस्था और कृषि नीति ऐसी है कि कृषि अभी भी पुरातन नीतियों पर आधारित है शासन और प्रशासन स्तर पर दीर्घकालिक सहकारी बैंकिंग नीतियाॅ निर्मित होती है। जिनका संबंध कृषि क्षेत्र की वास्तविकता से नहीं होता। कोरे सिद्धंात पर आधारित सहकारी बैंकिंग की नीतियों के चलते कृषि आज भी नई परम्पराओं को स्वीकार नहीं कर पाती। देश के कुछ क्षेत्रों को अगर छोड़ दे तो कृषि फर्म और कृषक का नाम आते ही एक विचित्र पीड़ा का बोध होता है। भारत का किसान आज भी दो जून की रोटी के लिए मोहताज है उर्वरताविहीन खेत, लगातार घटते कृषि संसाधन, पढ़े लिखे विकासशील लोगों का कृषि से दूर हटना भौतिक संसाधनों की बढ़ती कीमतें समय अनुकूल बीज खाद एवं अन्य सहायक वस्तुए कृषि यंत्रों की भारी कीमतें उत्पादन विक्रय की सार्ख क नीति का आभाव आदि के चलते सतना जिले की कृषि अभी भी अधोगामी है।
विगत वर्षो में ग्रामीण विकास के उन्नयन के लिए जिला सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक द्वारा उठाए गये प्रभावी कदमांे में सबसे महत्वपूर्ण जिले के विभिन्न क्षेत्रों में कृषि बैंकों, जिनके माध्यम से कृषिकों कृषि उत्पादों का समर्थन मूल्य मिलने की गारंटी दी गई है।
तथ्यों का सारणीयन एवं व्याख्या:-
धान सतना जिले की प्रमुख उाद्यान फसल है। धान की पैदावार खरीफ में की जाती है। इसके उत्पादन में अत्यधिक अनिश्चितता होती है। धान की पैदावार में वृद्धि लाने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किये जा रहें है। वर्तमान समय में सिंचाई के साधनों में वृद्धि होने तथा नहरों के विकास से धान की पैदावार एवं उत्पादित क्षेत्र फल ने वृद्धि हो रही है।
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि वर्ष 2009-10 में धान फसल का कुल बोया गया क्षेत्रफल 143.3 (000 हेक्टेयर) था जिस पर उत्पादन 138.1 (000 टन) जिसकी उत्पादकता 964 किग्रा. प्रति हेक्टेयर थी। वर्ष 2015-16 में धान का कुल बोया गया क्षेत्रफल 120.4 (000 हेक्टेयर) है। जिस पर 141.8 (000 टन) उत्पादन हुआ। जिसकी उत्पादकता 1178 किग्रा. हेक्टेयर हो गई है।
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि धान, गेहूॅ, सोयाबीन, सरसो की औसत उत्पादकता में वृद्धि हो रही है अन्य फसलों के उत्पादन में उतार-चढ़ाव है। व्यावसायीकरण और यंत्रीकरण के प्रभाव से मोटे अनाज, ज्वार, मक्का और तिलहन में अलसी का उत्पादन क्षेत्रफल घटा है जिससे इन फसलों की औसत उत्पादकता किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर में कम हो गई है।
निष्कर्ष:-
कृषि विपणन तकनीकी में सुधार, कृषि उत्पादन में वृद्धि, मध्यस्थों की समाप्ति, कृषि विनिमय हेतु वित्तीय सुविधाएॅ, कृषि उत्पाद मूल्य में वृद्धि तथा कृषि विपणन का व्यावसायिक कार्य, व्यवसायिक अनुभव, पूॅजी निवेश, छोटे कृषि व्यापारियों को संरक्षण कृषि के लिए वित्तीय सुविधाएॅ, व्यावसायिक प्रशिक्षण, यातायात का विकास, भण्डारण प्रक्रिया में सुधार, व्यावसायिक स्थिति का मूल्यांकन, मूल्य में स्थिरता जैसे अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। कृषि विपणन में जमाखोरी की समाप्ति, कृषि क्षेत्र को औद्योगिक क्षेत्र मानने के साथ-साथ गांवो में कृषि उत्पाद के विक्रय हेतु आवश्यक सुविधाएॅ प्रदान करने का प्रयास होगा। कृषि विपणन क्षेत्र में सहाकरी समितियों के विकास हेतु कृषि विपणन क्षेत्र में सहकारी समितियों के विकास हेतु सरकारी एजेन्सी द्वारा कम मात्रा का पूर्व निर्धारण उत्पादक व व्यापारियों से कृषि आय में वृद्धि जैसे उपायों को अपनाने से कृषि विपणन तथा कृषि उपज में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। कृषि उपकरणों वित्तीय सुविधाओं में वृद्धि के साथ ही अन्य आवश्यक मूलभूत सुविधाओं में विकास हेतु उपाय किये जायेगे। सहकारी विपणन व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया जाएगा उत्पादको को उचित मूल्य दिलाए जाने के साथ ही पूंजीवादी बाजार को रोकने का प्रयास किए जाएगा, साथ ही कृषि विपणन व्यवसाय का विस्तार किया जाएगा, विस्तार के साथ ही देश वे अन्य विकसित राज्यों की कृषि विपणन के समान किया जाएगा।
संदर्भ ग्रंथ सूची:-
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Received on 18.06.2019 Modified on 10.07.2019
Accepted on 31.07.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(3):701-706.